मजदूर

हमसे भारत , हम भारत भाग्य विधाता खुद के भाग्य लिए मरने को मजबूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं-हां मैं मजदूर हूं

चल पड़ा हूँ जीवन पथ पर मंजिल मीलों दूर है, चलना मेरी मजबूरी है।
हां मैं मजदूर हूं-हां मैं मजदूर हूं

बिना रुके बिना थके आसमान के साथ मैं चल पड़ा हूं धूप की छांव में,चलने को मजबूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं-हां मैं मजदूर हूं

जीने की आस लिए परिवार को साथ लिए, असंभव को संभव करके चलने को मजबूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं-हां मैं मजदूर हूं 

अपने ही घर में प्रवासी बनकर, चल पड़ा हूं निराश होकर क्योंकि मैं मजबूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं - हां मैं मजदूर हूं 

बचत की खपत के बाद , शहर की बेरुखी से गांव की गोद में जाने को मजबूर हूं 
हां मैं मजदूर हूं - हां मैं मजदूर हूँ

थकान के चादर में पटरियों पर मौत की नींद सोने को मजबूर हूं ।
हां मैं मजदूर हूं - हां मैं मजदूर हूं 

छाती में चिराग की दूध लिए बिना ममता लुटाई, आंचल समेटकर दुनिया छोड़ जाने को मजबूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं - हां मैं मजदूर हूं

प्रशांत गौतम ✍️✍️
मुजफ्फरपुर,बिहार

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