परशुराम की प्रतीक्षा खण्ड-१
परशुराम की प्रतीक्षा ✍️✍️✍️ रामधारी सिंह दिनकर खण्ड-१ गर्दन पर किसका पाप वीर ढ़ोते हो ? शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ? उनका , जिनमें कारुण्य असीम तरल था, तारुण्य-ताप था नहीं ,न रंच गरल था; सस्ती सुकीर्ति पाकर जो फूल गए थे, निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गए थे, गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं, तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं; शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का, शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का; सारी वसुंधरा में गुरु-पद पाने को, प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को जो संत लोग सीधे पाताल चले थे, (अच्छे हैं अब : पहले भी बहुत भले थे ।) हम उसी धर्म की लाश यहां ढोते है, शोणित से संतों का कलंक धोते हैं। Prashant Gautam मुजफ्फरपुर