परशुराम की प्रतीक्षा खण्ड-१
परशुराम की प्रतीक्षा
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रामधारी सिंह दिनकर
खण्ड-१
गर्दन पर किसका पाप वीर ढ़ोते हो ? शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?
उनका , जिनमें कारुण्य असीम तरल था, तारुण्य-ताप था नहीं ,न रंच गरल था;
सस्ती सुकीर्ति पाकर जो फूल गए थे,
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गए थे,
गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं, तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;
सारी वसुंधरा में गुरु-पद पाने को,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को
जो संत लोग सीधे पाताल चले थे,
(अच्छे हैं अब : पहले भी बहुत भले थे ।)
हम उसी धर्म की लाश यहां ढोते है,
शोणित से संतों का कलंक धोते हैं।
Prashant Gautam
मुजफ्फरपुर
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